नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली से एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। उपलब्ध आधिकारिक रजिस्ट्रेशन और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राजधानी में 800 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें बच्चे, महिलाएं और पुरुष शामिल हैं। यह आंकड़ा अलग–अलग थाना क्षेत्रों में दर्ज मिसिंग पर्सन शिकायतों के आधार पर सामने आया है, जिसने प्रशासन और समाज—दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
कौन होते हैं लापता?
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, लापता लोगों में
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नाबालिग बच्चे (घर से भटक जाना, बहलाकर ले जाना)
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युवतियां और महिलाएं (घरेलू विवाद, काम की तलाश, धोखाधड़ी)
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मानसिक रूप से अस्वस्थ या बुज़ुर्ग
जैसे कई वर्ग शामिल हैं। कई मामलों में लोग काम, पढ़ाई या निजी कारणों से घर छोड़ते हैं और फिर संपर्क नहीं हो पाता।
पुलिस का क्या कहना है?
Delhi Police का कहना है कि हर शिकायत दर्ज होने के बाद तत्काल जांच शुरू की जाती है। सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल, सोशल मीडिया ट्रेसिंग और दूसरे राज्यों की पुलिस से समन्वय जैसे कदम उठाए जाते हैं।
पुलिस यह भी स्पष्ट करती है कि लापता घोषित होने का मतलब अपराध होना जरूरी नहीं, लेकिन हर मामले को गंभीरता से लिया जाता है।
कई केस सुलझते भी हैं
रिकॉर्ड बताते हैं कि कई लापता लोग बाद में सुरक्षित मिल जाते हैं—कुछ अपने घर लौट आते हैं, तो कुछ अन्य शहरों से बरामद होते हैं। इसके बावजूद, जो लोग लंबे समय से नहीं मिले, वे परिवारों के लिए सबसे बड़ी चिंता बने हुए हैं।
सामाजिक कारण भी जिम्मेदार
विशेषज्ञों के अनुसार,
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तेज़ी से बढ़ती आबादी
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बेरोज़गारी और आर्थिक दबाव
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पारिवारिक कलह
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महानगरों में गुमनामी
जैसे कारण लापता मामलों को बढ़ाते हैं। दिल्ली जैसे बड़े शहर में भीड़ और पलायन भी एक बड़ी वजह मानी जाती है।
परिजनों की पीड़ा
लापता लोगों के परिवार महीनों–सालों तक थानों और दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं। कई माता–पिता के लिए यह इंतज़ार खत्म न होने वाला दर्द बन जाता है। कुछ परिवार सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी समूहों की भी मदद लेते हैं।
प्रशासन से क्या उम्मीद?
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि
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डिजिटल मिसिंग पर्सन डेटाबेस
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थाना स्तर पर विशेष टीम
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अंतरराज्यीय समन्वय को और मजबूत करना
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जन-जागरूकता अभियान
जैसे कदम मामलों को तेजी से सुलझाने में मदद कर सकते हैं।
दिल्ली में 800 से अधिक लोगों के लापता होने की खबर केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की टूटी उम्मीदों और बेचैन रातों की कहानी है। ज़रूरत है कि प्रशासन, समाज और नागरिक—तीनों मिलकर इस गंभीर समस्या को समझें और संवेदनशीलता के साथ समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएं।
नोट: यह रिपोर्ट पुलिस में दर्ज शिकायतों और सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारियों पर आधारित है। किसी भी लापता व्यक्ति की जानकारी नज़दीकी थाने या पुलिस हेल्पलाइन को देना सामाजिक जिम्मेदारी है।









