---Advertisement---

बहन मर गई, बैंक नहीं माना! बुजुर्ग भाई ने खोदी कब्र, मैनेजर के सामने रख दिया कंकाल! पूरे देश में हड़कंप!

On: April 28, 2026 10:34 AM
Follow Us:
---Advertisement---

ओडिशा के कीनझर जिले में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। एक गरीब आदिवासी बुजुर्ग को अपनी मरी हुई बहन के खाते से 20 हज़ार रुपये निकालने के लिए इतना दौड़ाया गया कि उसे अपनी बहन की कब्र खोदकर उसका कंकाल बैंक मैनेजर के सामने रखना पड़ा। यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की क्रूरता की हकीकत है।

दिन था सोमवार, 27 अप्रैल 2026। कीनझर जिले के पाटना ब्लॉक में स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंक की मल्लीपसी शाखा पर सुबह-सुबह ही लोगों की भीड़ जमा हो गई। सबकी आंखें हैरान थीं, क्योंकि 50 साल का जीतू मुंडा — जो डियानाली गांव का रहने वाला है — अपने कंधे पर एक पुराना लकड़ी का बक्सा लेकर आया था। उस बक्से में थीं उसकी बड़ी बहन कलारा मुंडा (56) की हड्डियां।
जीतू ने बैंक के काउंटर पर वो हड्डियां रखीं और कहा, “यह रही मेरी बहन, जिसका खाता आपके पास है। अब तो मान लो कि वो मर चुकी है। अब मुझे उसके पैसे दे दो।”
बैंक कर्मचारियों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। किसी ने फ़ोन पर पुलिस को बुलाया, तो किसी की सांसें थम गईं। लोग इस घटना को देखकर रोने लगे।

क्यों उठाना पड़ा यह कदम?
कलारा मुंडा की मौत 26 जनवरी 2026 को बीमारी से हो चुकी थी। उसने अपनी एक गाय बेचकर करीब 20 हज़ार रुपये इसी बैंक में जमा किए थे। उसका पति और इकलौता बच्चा पहले ही चल बसे थे। इस दुनिया में जीतू ही उसका एक मात्र सहारा और वारिस था।
जीतू बताता है, “मैं बैंक के चक्कर काट-काटकर थक गया। हर बार वो लोग मुझसे कहते थे — ‘खाताधारक को लाओ, तभी पैसे मिलेंगे।’ मैंने बार-बार कहा कि मेरी बहन मर गई है। लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। उल्टे, ज़बरदस्ती कहते रहे कि खाताधारक को लेकर आओ। तो मजबूरन मैंने कब्र खोदी और उसका कंकाल निकालकर सबूत के तौर पर यहां ले आया।”
जीतू अनपढ़ है। उसे नहीं पता कि लीगल हीयर क्या होता है, नॉमिनी क्या होता है, और मृत्यु प्रमाण पत्र कैसे बनता है। उसे बस इतना पता था कि बहन ने मेहनत से पैसे जमा किए हैं और अब वो उसके परिवार के काम आने चाहिए।

पुलिस ने क्या कहा?
पाटना थाने के प्रभारी निरीक्षक किरण प्रसाद साहू मौके पर पहुंचे। उन्होंने बैंक अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा, “जीतू एक अनपढ़ आदिवासी आदमी है। उसे नहीं पता कि लीगल हीयर या नॉमिनी क्या होता है। बैंक के अधिकारियों की यह ज़िम्मेदारी थी कि वो उसे समझाते कि मृत व्यक्ति के खाते से पैसे कैसे निकलते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।”
पुलिस ने जीतू को आश्वासन दिया कि उसे उसका हक़ दिलवाया जाएगा। इसके बाद कंकाल को वापस ले जाकर सम्मान के साथ दोबारा दफनाया गया।

सरकार हरकत में, विपक्ष ने घेरा
इस घटना के बाद पूरे ओडिशा में राजनीतिक बवाल मच गया है। राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री सुरेश पुजारी ने कहा कि इस पूरे मामले में “मानवीय संवेदनाएं गायब थीं”। उन्होंने वादा किया कि दोषी बैंक अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
विपक्षी दल BJD और कांग्रेस ने भी सरकार को घेरा है। BJD ने सोशल मीडिया पर लिखा, “मुख्यमंत्री के जिले में ऐसी क्रूरता की तस्वीर — यह सोच से परे है।” कांग्रेस ने कहा कि बैंक अधिकारियों का यह उत्पीड़न बंद होना चाहिए।

यह सिर्फ एक मामला नहीं, सिस्टम की बीमारी है!

यह घटना सिर्फ जीतू मुंडा की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है। यह भारत के ग्रामीण बैंकिंग सिस्टम की एक बड़ी खामी को उजागर करती है। देश में लाखों गरीब, अनपढ़ और आदिवासी लोग हैं जो बैंकों के जटिल नियम-कायदों को नहीं समझ पाते। उन्हें कोई बताने वाला नहीं होता कि डेथ सर्टिफिकेट कैसे बनेगा, वारिसी प्रमाण पत्र कहां से मिलेगा, या नॉमिनी न हो तो क्या होगा।
जब सिस्टम लोगों की समझ से बाहर हो जाए और अधिकारी मदद के बजाय दहेज की तरह कागज़ात मांगने लगें, तो नतीजा यही होता है — एक भाई अपनी बहन की हड्डियां उठाकर बैंक जाता है।
जीतू की कहानी हम सबको शर्मसार करती है। यह सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ अंग्रेज़ी में फॉर्म भरने वाला और कागज़ी जंग जीतने वाला इंसान ही इस देश का नागरिक है? क्या गरीब की मौत का सबूत भी सिर्फ एक मुहर वाला कागज़ है, न कि उसकी असली हड्डियां?

यह खबर सोशल मीडिया द्वारा ली गई है, इस कंटेंट के लिए जनसेवा न्यूज जिम्मेदार नहीं है!

Dhiraj Kushwaha

My name is Dhiraj Kushwaha, I work as an editor on this website.

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment