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अंतिम संस्कार में कंधा देने कोई नहीं आया !! मजबूरी में दोनों बेटियों ने कंधा दिया

On: April 7, 2026 3:28 PM
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मढ़ौरा (सारण)
यह घटना महज़ एक खबर नहीं, बल्कि हमारे समाज की संवेदनशीलता पर खड़ा किया गया एक कठोर सवाल है। क्या गरीबीइंसान को इस कदर तन्हा कर देती है कि उसके जाने पर भी कोई साथ देने नहीं आता? मढ़ौरा प्रखंड के जवईनियां गांव में जोहुआ, उसने सामाजिक जिम्मेदारी की उस सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

जवईनियां गांव निवासी स्वर्गीय रविन्द्र सिंह की पत्नी बबीता देवी का 20 जनवरी को पटना में इलाज के दौरान निधन होगया। इससे करीब डेढ़ साल पहले परिवार के मुखिया रविन्द्र सिंह का भी देहांत हो चुका था। पिता की मौत के बाद से हीपरिवार आर्थिक तंगी और सामाजिक उपेक्षा से जूझ रहा था। किसी तरह उस समय अंतिम संस्कार की रस्में पूरी की गईं, लेकिन मां के निधन ने दोनों बेटियों को पूरी तरह तोड़ कर रख दिया।

मां का शव घंटों घर के बाहर रखा रहा। रिश्तेदार पहुंचे, गांव से कोई आगे आया। कंधा देने के लिए दोनों बेटियां गलियों मेंभटकती रहीं, हाथ जोड़कर मदद की गुहार लगाती रहीं, लेकिन मानो संवेदनाएं कहीं खो चुकी थीं। काफी देर बाद दोतीनलोग आए, तब जाकर किसी तरह चार कंधों पर अर्थी उठ सकी और अंतिम संस्कार हो पाया। अंत में वही दृश्य सामने आया, जिसने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दियामां की अर्थी को कंधा भी बेटियों ने दिया और मुखाग्नि भी उन्होंने ही दी।

मुखाग्नि देने वाली बेटी मौसम सिंह बताती हैं कि इलाज में जो थोड़ेबहुत पैसे थे, वे पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। अब हालातइतने खराब हैं कि रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है। सबसे बड़ी चिंता मां के श्राद्ध संस्कार को लेकर है। आर्थिक क्षमता है, ही कोई सहयोग करने वाला। इसी वजह से अंतिम संस्कार के बाद अब तक क्रिया भी नहीं उठ पाई है।

परंपरागत सोच आज भी बेटियों द्वारा श्राद्ध और क्रियाकर्म को पूरी तरह स्वीकार नहीं करती। ऐसे में ये दोनों बहनें परंपरा औरमजबूरी के बीच फंसी हुई हैं। उनका समाज और रिश्तेदारों से बस यही निवेदन है कि कोई आगे आकर मां के श्राद्ध संस्कार मेंसहयोग कर दे, ताकि उसकी आत्मा को शांति मिल सके।

यह कहानी सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि उस समाज का आईना है, जहां गरीब का दुख अक्सर नजरअंदाज करदिया जाता है। सवाल यही हैजब बेटियां मां को कंधा दे सकती हैं, मुखाग्नि दे सकती हैं, तो क्या समाज उनके दर्द में थोड़ासा कंधा देने की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता?

Dhiraj Kushwaha

My name is Dhiraj Kushwaha, I work as an editor on this website.

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